ख़ामोशी की ज़बान में दर्द ने बात कही,
रात ने तन्हा चाँद से सारी बात कही।
दिल की गलियों में उम्मीद का दीप जला,
टूटते ख़्वाबों ने फिर भी औक़ात कही।
हमने हर ज़ख़्म को हँसकर अपना लिया,
वक़्त ने लेकिन अपनी ही बात कही।
भीड़ में भी जो अकेला सा रह जाता है,
उसने ही सच में मोहब्बत की बात कही।
दिल ने फिर आज किसी बात से इनकार किया,
ख़्वाब ने नींद से चुपचाप समझौता किया।
शहर की धूल में पहचान धुँधली-सी रही,
हमने आईने से हर रोज़ किनारा किया।
वक़्त की चाल में हम हार भी सकते थे मगर,
हौसलों ने हमें गिरकर भी सँभाला किया।
किसी उम्मीद की आहट थी बहुत हल्की-सी,
दिल ने सन्नाटे में भी शोर सा महसूस किया।