ख़ामोशी ने ओढ़ ली है अब आवाज़ मेरी,
टूटे ख़्वाबों में कहीं गुम हो गई है हँसी मेरी।
ख़ामोशी ने ओढ़ ली है अब आवाज़ मेरी,
टूटे ख़्वाबों में कहीं गुम हो गई है हँसी मेरी।
हम मुस्कुराते रहे सबको संभालने में,और अंदर ही अंदर बिखरती गई ज़िंदगी मेरी।
जिसे अपना समझा, वही दूर चला गया,
दिल का भरोसा भी आज चूर चला गया।
हमने तो ख़ामोशी में भी निभाया सब कुछ,
वो कहकर गया—वक़्त बदल गया।
हमने जो चाहा, वो मुक़द्दर ने छीन लिया,
मुस्कान को भी आँखों से दूर कर दिया।
ख़ामोश रहकर भी बहुत कुछ कह गए हम,
पर समझने वाला ही कोई न रहा।
टूटकर भी बिखरने की इजाज़त न मिली,
ज़िंदगी ने रोने की भी राहत न मिली।
हम हँसते रहे सबको तसल्ली देने में,
ख़ुद अपने लिए थोड़ी-सी मोहलत न मिली।
हमने जिन लम्हों को दिल से सजाया था,
वही लम्हे आज आँखों में चुभते हैं।
किसी से शिक़ायत भी क्या करें अब,
दर्द तो वही देता है, जिससे उम्मीद होती है।