🌸 “वो इंतज़ार” 🌸
बरसों से वही बेंच थी पार्क में,
वही पेड़, वही शाम…
बस फर्क इतना था कि अब आरव अकेला बैठता था।
कभी इसी बेंच पर मीरा बैठा करती थी—
हँसते हुए, सपने बुनते हुए,
छोटी-छोटी बातों में बड़ी खुशियाँ ढूँढते हुए।
उनकी मोहब्बत शोर नहीं थी,
वो चुपचाप साथ चलने वाली मोहब्बत थी।
ना बड़े वादे,
ना कसमें—
बस “मैं हूँ” का भरोसा।
लेकिन ज़िंदगी को कुछ और ही मंज़ूर था।
मीरा को दूर जाना पड़ा…
कहते हैं समय सब ठीक कर देता है,
पर कुछ खालीपन
वक़्त भी नहीं भर पाता।
मीरा जाते वक्त बस इतना कह पाई—
“अगर मैं न रहूँ,
तो मेरी यादों से दोस्ती कर लेना…”
आज भी हर शाम,
आरव उसी बेंच पर बैठता है।
हवा जब बालों को छूती है,
तो उसे लगता है
मीरा पास ही है।
क्योंकि
सच्चा प्रेम साथ रहने का नाम नहीं,
बल्कि उस एहसास का है
जो दूरी में भी कभी कम नहीं होता। ❤️

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