एक छोटे से शहर में आरव और काव्या रहते थे।
दोनों की पहली मुलाकात कॉलेज की लाइब्रेरी में हुई। काव्या किताब ढूंढ रही थी, और वही किताब आरव के हाथ में थी। दोनों मुस्कुरा दिए — जैसे किस्मत ने पहली लाइन लिख दी हो।
धीरे-धीरे नोट्स का बहाना, चाय की मुलाकात और लंबी बातें… दोस्ती कब प्यार में बदल गई, उन्हें खुद भी पता नहीं चला।
आरव हमेशा कहता,
"अगर तुम साथ हो तो हर रास्ता आसान है।"
और काव्या हँसकर जवाब देती,
"बस वादा करो, हाथ कभी नहीं छोड़ोगे।"
लेकिन जिंदगी हमेशा सीधी नहीं होती।
आरव को नौकरी के लिए दूसरे शहर जाना पड़ा। दूरी आई, समय कम हुआ, पर दिलों की धड़कनें अभी भी एक-दूसरे के नाम थीं।
कभी देर रात फोन पर बातें,
कभी चुपचाप स्क्रीन पर एक-दूसरे की तस्वीरें देखना…
प्यार दूरियों से नहीं, भरोसे से चलता है — ये उन्होंने सीखा।
दो साल बाद, जब आरव वापस लौटा,
तो उसी लाइब्रेरी में घुटनों पर बैठकर बोला —
"क्या तुम फिर से वही किताब मेरे साथ पूरी जिंदगी पढ़ोगी?"
काव्या की आँखों में आँसू थे, पर होंठों पर मुस्कान —
"हाँ, अगर कहानी का नाम ‘हम’ होगा तो।" ❤️
और इस तरह उनकी अधूरी कहानी
हमेशा के लिए मुकम्मल हो गई। 💍✨
