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शेर

दिल की हर बात ज़ुबाँ तक न आई खामोशी ही आज हमारी गवाही बन आई।
हमने चाहा बहुत सच्चे दिल से वो समझे ही नहीं हमारी सादगी को।
वक़्त ने ऐसा खेल खेला हमारे साथ अपने ही अजनबी बनते चले गए।
हम मुस्कुराते रहे सबके सामने और दर्द ने अंदर घर बना लिया।
जिसे अपना समझा वही दूर चला गया भरोसा भी साथ ही टूट गया।
तन्हाई ने सिखा दिया जीना वरना हम भी बहुत नाज़ुक थे।
कुछ ख्वाब अधूरे रह गए आँखों में और उम्र बीत गई उन्हें पूरा करते-करते।
मोहब्बत की थी कोई शर्त नहीं थी फिर भी हर मोड़ पर हार मिली।
अब शिकायत नहीं किसी से भी दर्द भी अब आदत सा हो गया है।
वो बदल गए तो क्या हुआ हम भी अब पहले जैसे नहीं रहे।
दिल टूटने की आवाज़ नहीं होती पर असर उम्र भर रहता है।
कभी जो सब कुछ था हमारा आज बस एक याद बनकर रह गया।
हम चुप रहे तो सब ठीक समझा गया किसी ने ये नहीं पूछा—हाल कैसा है।
जिसे भूलना चाहा वही याद आया और जिसे चाहा वही दूर गया।
आज भी वहीं ठहरे हैं हम जहाँ किसी ने कहा था—मैं लौट आऊँगा।

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