जयपुर की ठंडी सुबह थी।
हवा में हल्की सी गुलाबी ठंडक थी।
सड़क के कोने पर एक छोटी सी चाय की दुकान…
जहाँ हर रोज़ एक लड़का आता था — कबीर।
कबीर शांत स्वभाव का, किताबों में खोया रहने वाला लड़का था।
और उसी चाय की दुकान पर रोज़ आती थी — आन्या।
हँसमुख, तेज़ बोलने वाली, आँखों में सपने लिए।
पहली बार दोनों की नजरें टकराईं…
बस एक सेकंड के लिए।
पर वो एक सेकंड, कबीर के लिए पूरा दिन बन गया।
अगले दिन आन्या ने मुस्कुराकर कहा,
“आप भी रोज़ यही आते हैं?”
कबीर ने हल्की सी मुस्कान के साथ जवाब दिया,
“शायद अब आने की वजह मिल गई है।”
धीरे-धीरे चाय की दो कुल्हड़
दो दिलों की आदत बन गईं।
कभी मौसम की बातें,
कभी सपनों की बातें,
कभी खामोशियाँ…
जो शब्दों से ज़्यादा बोलती थीं।
एक दिन आन्या बोली,
“मैं दिल्ली जा रही हूँ… नौकरी के लिए।”
कबीर के हाथ से चाय का कुल्हड़ हल्का सा कांप गया।
वो मुस्कुराया… पर आँखें कुछ और कह रही थीं।
आखिरी दिन, वही चाय की दुकान, वही सुबह।
कबीर ने जेब से एक छोटा सा कागज़ निकाला।
उस पर लिखा था —
"अगर किस्मत ने चाहा,
तो ये चाय की खुशबू हमें फिर मिलाएगी।"
आन्या ने वो कागज़ अपने दिल के पास रख लिया।
सालों बाद…
दिल्ली की एक बड़ी कॉन्फ्रेंस में,
भीड़ के बीच फिर वही नजरें मिलीं।
आन्या मुस्कुराई —
“लगता है चाय की खुशबू सच में रास्ता ढूंढ लेती है।”
कबीर ने कहा —
“और कुछ प्रेम कहानियाँ वक्त से नहीं,
वक्त के साथ पूरी होती हैं।” ❤️