गंगा किनारे बसे एक छोटे से शहर में आर्यन रहता था। सादा-सा लड़का, कम बोलने वाला, लेकिन आँखों में सपनों का समंदर। उसकी दुनिया किताबों, चाय और शाम की सैर तक सीमित थी।
उसी शहर में अनन्या आई—नौकरी के सिलसिले में। तेज़, आत्मनिर्भर और मुस्कुराहट ऐसी कि सामने वाला बिना वजह खुश हो जाए। पहली मुलाक़ात बस यूँ ही हुई… बारिश में।
आर्यन चाय की दुकान पर खड़ा था, अनन्या भीगती हुई आई और बोली,
“एक अदरक वाली चाय मिलेगी?”
आर्यन ने बिना देखे कहा,
“यहाँ चाय के साथ सुकून भी मिलता है।”
अनन्या मुस्कुरा दी। यहीं से कहानी शुरू हुई।
धीरे-धीरे रोज़ की मुलाक़ातें आदत बन गईं। बातें छोटी थीं, लेकिन एहसास गहरे। अनन्या अपने शहर, अपने टूटे रिश्तों की बात करती, और आर्यन चुपचाप सुनता—बिना टोके, बिना सलाह दिए। शायद इसी में उसे सुकून मिलता था।
समय बीतता गया। दोनों को एहसास हो गया कि यह सिर्फ दोस्ती नहीं है। लेकिन डर था—कह देने का डर।
एक शाम अनन्या बोली,
“अगर कभी मैं चली जाऊँ, तो?”
आर्यन ने पहली बार आँखों में आँखें डालकर कहा,
“तो शहर खाली हो जाएगा।”
अनन्या समझ गई।
पर ज़िंदगी इतनी आसान कहाँ होती है। अनन्या को बड़ी कंपनी से ट्रांसफर मिल गया—दूसरे देश। सपना भी, मौका भी।
जाने से पहले वह उसी चाय की दुकान पर आई।
“आर्यन… कुछ रिश्ते साथ रहकर नहीं, इंतज़ार करके निभाए जाते हैं।”
आर्यन ने बस इतना कहा,
“मैं इंतज़ार कर सकता हूँ… उम्र भर।”
दूरी आ गई, समय आ गया, अकेलापन भी आया। कभी वीडियो कॉल, कभी लंबे मैसेज, कभी खामोशी। कई बार लगा सब टूट जाएगा। कई बार अनन्या रोई, कई बार आर्यन ने खुद को मज़बूत दिखाया।
सात साल बीत गए।
एक दिन उसी शहर में, उसी घाट पर, उसी चाय की दुकान के पास—अनन्या फिर खड़ी थी। इस बार सूटकेस नहीं, हाथ में एक छोटा-सा फूल था।
आर्यन ने पूछा,
“अब कहीं नहीं जाना?”
अनन्या की आँखों में आँसू थे, मुस्कान भी।
“अब जहाँ तुम हो, वहीं मेरा घर है।”
आर्यन ने उसका हाथ थाम लिया।
उस दिन कोई वादा नहीं किया गया,
क्योंकि कुछ प्यार वादों से नहीं—साथ से पूरे होते हैं।
सच्चा प्रेम वही है,
जो समय, दूरी और तकलीफ़—तीनों से लड़कर भी ज़िंदा रहे। ❤️
