❤️ “ख़ामोश मोहब्बत” ❤️
छोटे से शहर में रहने वाला आरव रोज़ उसी चाय की दुकान पर बैठता था। वजह चाय नहीं थी… वजह थी मीरा।
मीरा हर सुबह अपने कॉलेज जाते हुए वहीं से गुज़रती, किताबें सीने से लगाए, हल्की-सी मुस्कान के साथ।
आरव ने कभी उससे बात नहीं की।
बस दूर से देखता रहा…
कभी उसकी हँसी,
कभी उसका उदास चेहरा।
वक़्त बीतता गया।
दिन हफ्तों में बदले,
और हफ्ते महीनों में।
एक दिन मीरा नहीं आई।
दूसरे दिन भी नहीं।
आरव का दिल बेचैन हो उठा।
तीसरे दिन वह हिम्मत करके दुकान वाले से पूछ बैठा—
“वो लड़की… जो रोज़ आती थी?”
दुकानदार बोला,
“अरे, उसकी शादी तय हो गई है। आज आख़िरी दिन था कॉलेज का।”
आरव चुप हो गया।
शायद पहली बार उसे एहसास हुआ कि
जिसे वो हर रोज़ देखता था,
वो उसकी आदत नहीं… मोहब्बत थी।
उसी शाम, चाय की दुकान पर एक चिट्ठी पड़ी मिली—
मीरा की लिखी हुई।
उसमें लिखा था—
“मैं जानती हूँ तुम रोज़ मुझे देखते थे।
मैं भी तुम्हें देखती थी।
हम दोनों खामोश थे,
पर मोहब्बत बोलती रही।
अगर किसी और जन्म में मिलें,
तो इस बार देर मत करना।” ❤️
आरव की आँखें नम हो गईं,
पर चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी।
क्योंकि
कुछ प्रेम कहे नहीं जाते…
वो बस महसूस किए जाते हैं ❤️

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