शीर्षक: “चाय की आख़िरी चुस्की”
हर शाम स्टेशन के बाहर वही छोटी-सी चाय की दुकान लगती थी।
आरव रोज़ ऑफिस से लौटते वक्त वहीं रुकता—
दो घूँट चाय, और थोड़ी-सी थकान उतारने के लिए।
उसी दुकान पर अक्सर काव्या भी आती थी।
वो चाय में चीनी कम करवाती थी,
और आरव… ज़्यादा।
एक दिन दुकानदार बोला,
“आज चीनी ख़त्म है।”
काव्या मुस्कुराई,
“कोई बात नहीं।”
आरव ने अपना कप उसकी तरफ बढ़ाया,
“मेरी ज़्यादा मीठी है।”
वही पहली साझी चुस्की थी।
फिर रोज़ छोटी बातें होने लगीं—
ऑफिस की, बारिश की,
और कभी-कभी ख़ामोशी की।
एक शाम काव्या नहीं आई।
दूसरे दिन भी नहीं।
तीसरे दिन आरव ने पूछ लिया।
दुकानदार बोला,
“लड़की तो बहुत पहले से आती थी,
आज उसकी नौकरी दूसरे शहर में लग गई।”
उस शाम चाय बहुत कड़वी लगी।
हफ्तों बाद वही दुकान, वही शाम…
और काव्या।
आरव ने पूछा,
“अब?”
काव्या बोली,
“कभी-कभी ज़िंदगी मीठी होने के लिए
थोड़ी कड़वी भी बनती है।”
आरव ने मुस्कुरा कर कहा,
“फिर आज दो कप—एक कम चीनी, एक ज़्यादा।”
दोनों हँस दिए।
और चाय…
फिर से मीठी लगने लगी ❤️
