शीर्षक: “नाम से पहले एहसास”
शहर की भीड़ में रोज़ एक बस चलती थी।
उसी बस में हर सुबह आदित्य चढ़ता था—ख़ामोश, खिड़की वाली सीट पर बैठने वाला।
और हर सुबह सामने की सीट पर बैठी होती थी मीरा—आँखों में मुस्कान और हाथ में किताब।
दोनों रोज़ देखते थे,
पर कभी बात नहीं हुई।
एक दिन बस देर से आई।
लोग परेशान थे।
मीरा ने किताब बंद की और बोली,
“लगता है आज कहानी देर से शुरू होगी।”
आदित्य मुस्कुरा दिया।
यही उनकी पहली बात थी।
फिर रोज़ छोटी-छोटी बातें होने लगीं—
कभी बारिश पर,
कभी पसंदीदा ग़ज़लों पर।
आदित्य कम बोलता था,
मीरा ज़्यादा समझती थी।
एक दिन आदित्य नहीं आया।
दूसरे दिन भी नहीं।
तीसरे दिन मीरा ने ड्राइवर से पूछा।
ड्राइवर बोला,
“वो लड़का? उसकी पोस्टिंग बदल गई है।”
मीरा ने पहली बार महसूस किया—
कुछ छूट गया है।
हफ्तों बाद,
वही बस… वही सीट…
और आदित्य।
मीरा ने पूछा,
“कहाँ थे?”
आदित्य बोला,
“कहीं नहीं… बस यह समझने गया था
कि कुछ एहसास नाम से पहले भी होते हैं।”
मीरा मुस्कुरा दी।
बस चलती रही…
और दो दिल,
अब एक ही कहानी पढ़ने लगे ❤️
