शाम का वक्त था। नदी के किनारे बैठा कबीर पत्थरों पर पानी की लहरें गिन रहा था। तभी दूर से पायल की आवाज़ आई। उसने पलटकर देखा—वही थी, अनोखी। सफ़ेद दुपट्टा, आँखों में चमक और चेहरे पर वो सुकून जो हर दिल को ठहरा दे।
दोनों की मुलाक़ातें उसी नदी के किनारे होने लगीं। कभी खामोशी में, कभी हँसी में। शब्द कम थे, एहसास पूरे। कबीर को लगा—प्यार शायद ज़ोर से नहीं, धीरे-धीरे दिल में उतरता है।
एक दिन अनोखी बोली, “मुझे शहर जाना होगा… हमेशा के लिए।”
कबीर मुस्कुरा दिया, पर आँखें नम थीं। बोला, “अगर लौट आई, तो इसी जगह मिलेंगे।”
साल बीते। नदी वैसी ही रही, किनारे बदल गए। एक शाम फिर पायल की आवाज़ गूँजी। कबीर ने देखा—अनोखी सामने थी, उसी मुस्कान के साथ।
वो बोली, “कुछ रिश्ते दूरी से नहीं टूटते।”
कबीर ने कहा, “कुछ प्यार इंतज़ार से और गहरे हो जाते हैं।”
नदी बहती रही… और दो दिलों की कहानी भी। ❤️
